रुबाइयात
रुबाइयात
आते रहे अम्बिया कमा क़ीला लहुम
वल ख़ातमो ह़क़्क़ोकुम कि खा़तिम हुए तुम
यानी जो हुआ दफ़्तरे तन्ज़ील तमाम
आख़िर में हुई मोह़र कि अकमलतु लकुम
शब लिह़या व शारिब है रुख़े रोशन दिन
गेसू व शबे क़द्रो बराते मोमिन
मिज़्गां की सफ़ें चार हैं, दो अब्रू हैं
वल फ़जर् के पहलू में लियालिन अ़सरिन
अल्लाह की सर ता ब क़दम शान है यह
इनसा नहीं इन्सान वोह इन्सान हैं यह
कुरआन तो ई़मान बताता है इन्हें
ई़मान यह कहता है मेरी जान हैं यह
बोसा गहे अस्हाब वोह मेहरे सामी
वोह शानए चप में उस की अ़म्बर फ़ामी
यह तुर्फा कि है काबए जानो दिल में
संगे अस्बद नसीब रुक्ने शामी
काबे से अगर तुरबते शह फ़ाज़िल है
क्यूँ बाई त़रफ़ उस के लिये मन्ज़िल है
इस फ़िक्र में जो दिल की त़रफ़ ध्यान गया
समझा कि वोह जिस्म है यह मरक़दे दिल
तुम जो चाहो तो क़िस्मत की मुसीबत टल जाए
क्यूंकर कहूं साअ़त से क़ियामत टल जाए
लिल्लाह उठा दो रुख़े रोशन से निक़ाब
मौला मेरी आई हुई शामत टल जाए
यां, शुबा शबीह का गुज़रना कैसा !
बे मिस्ल की तिम्साल संवरना कैसा
इन का मुतअ़ल्लिक़ है तरक़्की पे मुदाम
तस्वीर का फिर कहिये उतरना कैसा
यह शह की तवाज़ोअ़ का तक़ाज़ा ही नहीं
तस्वीर खिंचे उन को गवारा ही नहीं
मा’ना हैं यह मानी कि करम क्या माने
खिंचना तो यहां किसी से ठहरा क्या है